Thursday, September 16, 2010

तुम हो तो... मैं भी

 
आसमान या के सारी ज़मीन
समंदर या के हवा या तूफ़ान
बिखरे हैं चारों ओर
फैला के यही शोर
कि
तुम्हारे लिए ही तो हैं हम...
 
मुझे अपने आगे सभी पिद्दी समझ आते हैं
मुझे खुदाई के सपने नहीं आते हैं
 ना तो है जन्नत कि जरूरत
ना बाकि है किसी ख्वाहिश का निशान
ना बाकि है जेहन में किसी खुदा कि इबादत
 
लेकिन
पांच दिनों से
ना तो नींद
ना भूख
ना प्यास
कहाँ का आसमान?, कैसा समंदर?
मुझे तो...
'मैं' ही ना मिला
जन्नत तो दोज़ख में छुप गयी
आ जाओ
इस बियांबान को फिर से दो अपनी सांस
अपने होने का एहसास
 
क्यूंकि
तुम हो 
तो सब कुछ है...
मैं भी|| 

Wednesday, September 15, 2010

अब जब की तुम हो... पर नहीं हो

उफ़ ये दिल्ली,
ना तो शाम, ना ही रात;
चारों तरफ बस बिजली के लट्टू |
खो गई है रात,
इनके बीच
चाँद भी शायद
अब वो आशिक-ए-लैला को
मयस्सर नहीं
कोई सितारा
गिरेगा मेरी आँखों के कोटरों में
जब वो आखिरी बार बंद होंगी, तभी शायद
तब तक क्या करूँ?
ना तो दिल्ली की दीवारों में
अब
ना तो ग़ालिबन खिड़की है
ना ही कोई खुदाई
सांस लेने भर से आती है उबकाई
कहाँ गयी वो मुग़ल गार्डेन के फूलों की ख़ुश्बू?
शायद
एक्स्ट्रा प्रीमियम ने बहर दी है उनकी जगह
शाम --
रात के इंतज़ार में
लेकिन
रात से पहले ही बीती
ऐसा क्यों कर हुआ...???
सब कुछ ऐसा बदला
दिन सूरज का न रहा
चंदा की चांदनी नई नस्ल ने नहीं देखी
कितनी मुश्किल है
एक आशिक के लिए दिल्ली की ज़िन्दगी
चाँद दिखे तो ना...
तुम कैसे दिखोगे...?
नेटवर्क में कंजेशन के कारण...
कैसे बात करूँ?..
ग़ालिब
काश
आज की दिल्ली तुम्हें नसीब होती 
देखता मैं भी तुम्हारी जादूगरी
अपने आपको आधा हिन्दू, आधा मुसलमान
क्यूंकि
रोक दिए जाते जरूरतों के तंग दायरे में ---
एक चाँद
तारे
एक रात
चांदनी
हवा
थोड़ा सा सन्नाटा
एक कोई अपना |
सबसे महरूम
फिर भी एक आस बची है कि
शायद बत्ती गुल होगी
स्ट्रीट लाइटें भी अँधेरे में खो जायेंगी
तब
शायद
मैं
तुम
या फिर हम
मिलेंगे चांदनी के दोनों किनारों पर
और अचानक
साड़ी मोटरें और जेनेरेटर बंद होंगे
या खिदा
ये ख्वाहिशे आशिक
तेरी रहमत में तब्दील हो
आमीन..
कौन कहता है कि ग़ालिब अब कभी पैदा नहीं होगा
हुज़ूर - बिना चांदनी के भी चाँद
टहलता है आसमान में
आज देख भी लिया
सच है
ग़ालिब फिर नहीं पैदा होगा ||

Tuesday, September 7, 2010

गच्च गच्च आत्मा

आज सब्ज़ी की खरीद फरोख्त में टमाटरों के रेहड़ी वाले से टकरा गया. अद्भुत, अविस्मर्णीय था आनन्द जो बारिश के साथ छन छन कर कानों पर गिरा. "अरे अभी एक गिराहक आया था, बोला भाई तरी वाली सब्जी के लिए टमाटर चाहिए बढ़िया वाले वो भी चालीस किलो. राम कसम मेरी तो आत्मा ही गच्च गच्च हो गयी ". हमने भी सुर मिलाया इस आत्मा की गच्चता में की "आज के आनन्द की जय हो".

तो बात थी आत्मा की
जो की बीसवीं सदीं में
होर्डिंग्स के होड़ में
जूतों के जोड़ में
अंग वस्त्रों की गाँठ में
बन्दूक की नाल में
तबलों की ताल में
जवानी की अंगड़ाई में
सड़क पर उगी खाई में
दिन के अंधेरों में
और रात के उजालों में
उपलब्ध है - आपके शहर में
मेरी आत्मा - गच्च गच्च आत्मा

आपके शहर में
एक पर एक या फिर एक के साथ दो
या फिर किसी और के साथ
बिना किसी जज़्बात
दिन हो या रात
लुटने को
नहीं नहीं - लूटने को उपलब्ध है
मेरी आत्मा -- गच्च गच्च आत्मा

Sunday, September 5, 2010

धूल

बारिश ने ज़िन्दगी को दी थोड़ी सी हूल है

पर क्या होगा आदम वल्द खुदा का जब दिल में बस गयी सिर्फ धूल ही धूल है

हर एक मूंछ के बाल से, तहज़ीब की तलवार से, ताज्ज़ुर्बे की झुर्रियों से
जवानी के बल से, मतवाली की मुस्कान से, रत जग्गों के शोर से,
चहुँ दिस झरती जाती है
रोके से ना रुक पाती है
जाने किस मुए की जवानी है, जिसमें बचा नहीं थोड़ा भी पानी है

क्या बताऊँ भाई अब मिलते नहीं यहाँ मस्ती के फूल हैं
तभी तो इतनी मस्त बारिश के बाद भी पत्तियों पर धूल है
पुरन्दर का भी हौसला पस्त है
क्यूंकि घनघोर वृष्टि में भी कीचड़ साला पेड़ के ऊपर मस्त है