Wednesday, August 31, 2011

ईदी

वो बचपन के कुछ साल
जो पलझपकते पीछे चले गए
सुकून भरे थे
कर्बला और ईदगाह दोनों के रास्ते
हमारे घर को छू कर जाते थे
हर साल
बिना नागा
सब कुछ खो जाता था - सुकून और ईमान में डूबी
पाकीज़ा खुशबु से
रज्ज़ाक खां के सबसे बड़े बेटे
मन्नू चा
ईद की नमाज़ के तुरंत बाद -
इत्र की खुशबु से
सारे रास्ते को गमगमाते आते थे हमारे घर
वो पान में महकी, पीक सँभालने को हुई हल्की तिरछी सी हुई जुबान
बुलाती थी हम सब बच्चों के नाम
जान हथेली पर ले कर, हर एक हवाई जहाज़ बनके
दौड़ता था, हर प्रतिद्वंदी से आगे निकलता था
उन ३ करारे एक दम नए छपे
कड़क
साफ़
एक रूपए के नोटों के लिए
शेरवानी की हर जेब से अलग - अलग
सेट में निकलते थे बाहर
एक जोरदार आवाज़ पुकारती थी पीछे छूट जाने वाले को
"हई ल हो बबुआ - ईदी ले ल आपन"
हर तीन रूपये की एक ही शर्त थी
गोद में चढ़ के गले मिलने की रस्म अदाएगी
और सबसे बुरी बात (जो सिर्फ मुझे लगती थी)
इत्र में डूबा एक रुई का टुकड़ा
रगड़ खाता हमसे और कान में साध दिया जाता
एक अरसा बीत गया
देखे सुने
इतना हरा सा
प्रेम में पगा सा
दिल में लगा सा
ईदी देने वाला
ये सच है कि
बचपन एक ऐसा दौर था
तब ईदी का ही हमारे ज़ेहन पे जोर था
आज भी है
अव्वल बात है - कि अब ऐसे एक रुपये के नोट नहीं मिलते
मिल भी जायेंगे
पर क्या बताएं
मन्नू चा नहीं मिल पायेंगे - अचानक खुदा के प्यारे हो लिए
अब तक हूँ इंतज़ार में
क्या आसमानों का इरादा है - उन्हें फिर
ईदी देने के लिए फिर से भेजने का?
हमारी अगली पीढ़ी कितनी गरीब हो निकली
क्यूंकि जनाब
हमारी तरह उन्हें मुहब्बत से भरी
ईदी जो नहीं मिलती है

Tuesday, August 30, 2011

हे मानस के राजहंस!!

हे भारत के जन मानस
प्रभु के सबसे प्रिय बालक
हे  निति धर्म के प्रखर दीप
हे पुण्य कर्म ध्वज के वाहक
हे राष्ट्र प्रेम के प्रखर तेज
 
तुम क्यूँ रूठे हो नैतिकता से
अपने अन्दर के नर पिशाच
क्यूँ ढक लेते हो सज्जनता से
आ जाओ कभी आवरण उतार
दिखलाओ अपने दन्त विकराल
 
कभी सत्य का पान कर
उन्नत कर लो काजल सा भाल
एक बार तो बतलाओ
तुमसे न बड़ा कोई घातक
कोई और नहीं बस तू ही है
इस भारत कुल का घालक
 
तू मिथ्याभाषी, व्यभिचारी, अत्याचारी तुम ही अरे !
 
ये भीख,
कटोरे में तुझको "इमानदारी" की क्यूँ चाहिए
तू जाग जरा, सुन अपना मानस
क्या धरा है औरों की बातों में
 
प्रसव वेदना को सह कर जब
इस जीवन को तू जी पाया
जननी से सीखा अमर प्रेम
फिर तू समाज में चल पाया
दर्द जनित हर क्रंदन को इस दुनिया में तू ले आया
हर बार दर्द के बदले में तुने निश्छल एक मन पाया
क्या सह ना सकेगा अरे कभी तू पीर कभी सच्चाई की?
और भला क्या देगा तू बदले में पीर पराये की 

Sunday, August 28, 2011

स्वर्ग और नर्क

स्वर्ग
सभ्य समाज का स्वप्न,
नर्क
पातकी का जीवन
सभ्यता की शर्त
ब्रह्म
धर्म
संयम
जीवन
आचार, व्यवहार, समाज में शाख़
नियमों की सांस में ढल कर
सच्चाई के मुखौटों में छुपकर
रोज़ सही किये जाते हैं हमारे मनवंतर
 २५० साल की गुलामी जीकर
आज भी डर में जी कर
एक स्वर्ग की आस पीकर
गुलामी की मौत के बाद भी
हम जीते हैं वो ही ख़्वाब, खुद से लड़कर
जो दलित नहीं हैं
कोमल इच्छाओं से जनित नहीं हैं
क्यूंकि नियमों से हुए जो दूर
स्वर्ग से स्खलित हो जाते हैं हुजूर
 
पातकी हर रोज़ नर्क में मदमस्त है
क्यूंकि पहले की ही तरह यहाँ नियम कानूनों ध्वस्त हैं
इसकी श्रेणी को और नीचे गिराया नहीं जा सकता
क्यूंकि लोकतंत्र की सीधी में कुछ बाकी नहीं बचता