Wednesday, December 11, 2013

जाना अगर

जाना अगर
दूर कभी मुझसे
वक़्त को इत्तेला किये जाना
मुझे कहीं न ले जाए
तुम्हारे लौट आने तक
थम जाए
मेरी उम्र ख़त्म होने तक

मेरा वजूद

मेरी खाँसी
और तुम्हारा मुझे याद करना
कब धुएँ के हर कश के साथ
दोहरे होने लगे
जैसे तुम्हारे ख़तों का आना
उँगलियों में उँगलियों का होना
या हाथों में सिमट जाना हाथ
मेरा वजूद पिघल पिघल के
गंगा के पानी सा
सिर्फ हाथ में सिमटा...
जो तुम्हारी हथेली के नीचे
पर
सूंस सा पलटता - उफनता
मेरे वजूद को
अब बस खाँसी आने पर
पता चलता है कि
तुम्हारे याद करने में ही
बस कुछ बाकी है...

Saturday, November 9, 2013

स्मृति शेष - १


इस बार बहुत सालों बाद, छठ पर घर होना था, जैसा कि शुरुआत कह रही है,  मैं घर नहीं गया। रविश जी कि छठ रपट पढ़ रहा हूँ, और छठ गीत सुन कर संगीत रस ले रहा हूँ। पूजा के गीत में संगीत!!!  
बाप बेटे का पहला झगड़ा था, बेटे ने धर्म, मंत्र और कर्मकाण्डों को ढकोसला बताया था। पर बेटे के चिर प्रतिद्वंदी (परन्तु प्रचलन अनुसार कमज़ोर माने जाने वाले) पिता ने बड़े प्यार से पूछा - विज्ञान तो मानते हो, या नहीं?

हर ध्वनि संगीत है, और हर संगीत ध्वनि है, ऊर्जा है। और यह हवा में ३३० मीटर/सेकण्ड कि रफ्तार से चलती है। चूँकि ना हम इसे पैदा कर सकते हैं और ना ही नष्ट कर सकते हैं, तो अगर एक ही आवाज़ मैं बार बार करूँ तो क्या होगा? E = M C स्क्वायर तो मानोगे, पहली बार निरुत्तर हुआ मैं, परन्तु ना मैंने जवानी के जोश में हार मानी, ना ही उन्होंने अपने विश्वास के पुल पर कोई आंच आने दी। परन्तु कभी भी नास्तिक होने से नहीं रोका।   

बंगाली मित्रों के सम्पर्क में आने के पहली बार बीरेन्द्र कृष्ण भद्र कृत महालय सुना। फिर एक नास्तिक ने पहली बार एक हिन्दी भाषी आस्तिक के लिये उपहार में बांग्ला प्रभावित, बीरेन्द्र कृष्ण भद्र कृत महालय की कैसेट उपहार में दी। उसको सुनते हुए उनकी आखों से आंसु गिरते देख पूछा "समझ में आ रहा है क्या?" पिताजी ने कहा "तुम संवेदना, भावना को भी नास्तिक-आस्तिक के लिए अलग अलग परिभाषित कर सकते हो क्या? पिता जी को गुजरे आज ४५ दिन होने को आये, बेमौसम महालय सुनाने के बाद, दो आंसू मेरी आँखों में हैं - आप भी सुनियेमहालय: बीरेन्द्र कृष्ण भद्र

Wednesday, May 22, 2013

मैं हो रहूंगी पाकी

तेरे मयकदे में कैसे ऐसी जगह है साकी 
रोज़ करने वुज़ू को आता है हर नमाज़ी 

ऐसी जगह बता दे तेरे बुतकदे में बनवारी 
पैमाना भरा हो मय से पर मिल न पाए साकी 

ख़ाक -ए -सुपुर्द के पहले पी  लेने दो मेरे हाज़ी 
की पैमाने की मिट्टी पीती नहीं है दारु 

मिट जाएगा भरम का साया 
इस बुतकदे के डर का 
जो तूने दे दी मुझको भर भर के हर पियाली 
तू बनेगा मेरा साकी 
मैं हो रहूंगी पाक़ी 

अब तोड़ दे दीवारें मंदिर की ये पुरानी 
जाके ज़रा जला दे मस्जिद के वो दरवाजे 
रोके हुए हैं मुझको, संगदिल सी ये सलाखें 
ज़रा एक बार अपने दिल की पिला बनवारी 
तू बनके रहेगा बांके 
मेरे मन के मन का बिहारी 

एक बार जो तू मुझको दिल से पिला दे साक़ी 
जहाँ बुतकदे में  मुल्ला, और मस्ज़िद में हो पुजारी 

एक ठौर में हो दुनिया अल्लाह की राम प्यारी 
जब आब-ए -ज़म ज़म पे हो मय का नशा ही भारी 

Tuesday, April 30, 2013

वगैरह वगैरह

हम नाचते, बजाते जब जी में आता 
उड़ भी आते 

एक दिन
नाचते 
बजाते 
धमाके हो गए 
हमारे नाम लिख गए 

पहले हिन्दू /मुसलमान वगैरह वगैरह 
फिर दगी गोली भूमिहार/ठाकुर /चमार वगैरह 
चिटपुटिया बजी एक रोज़ 
के अब तुम 
हिन्दुतानी पाकिस्तानी वगैरह वगैरह 
अब हर रोज़ 
एक दियासलाई जलती है 
हमें कभी आम, कभी ख़ास 
कभी वगैरह वगैरह करती है