Wednesday, January 29, 2014

हसरतें

हसरतें
मेरा शरीर
रहे ना रहे
हस्ती बनाती हैं

इनमें पैबस्त
उधेड़ बुन
सही ग़लत
ग़लत सही की
मेरे मिटने ...
और
बने रहने की
हदें तय करती हैं

हसरतें
शरीर
एक या अलग
मैं और मेरा होना
एक या अलग

क्या ग़लत की सही से
पहचान है अलग

मेरी आँखें
क्यूँ गुम हैं, अन्धेरों में
उजाले देखती हुई
एक पाक - स्याह कशिश से
चिपकी हुई

धड़कनें
हसरतें
उफान
आनन्द
अपराधबोध
की ज़मीन पर
फिर से गिर जाने के लिये
तैयार
अनवरत

कैसी है पहेली:

रेडियो पर विज्ञापन आ रहा है, किसी "कनक" आटे का
महिला आवाज़ कहती है कि
"मेरे पति की पसन्दीदा फूली रोटी मिनटों में, और मेरा फ़ेवरेट सीरियल भी नहीं छूटता"
जब से प्रचार सेवा है, कुछ बड़ा ही अजीब सा तरीक़ा दिखता है। हर बात के केन्द्र में अगर औरत है तो या तो वो अकारण वहाँ होती है, या गृहकार्य दक्षता की वकालत करती है, या फिर अबला होती है। अब आटो एक्सपो में देखियेगा, कार के माडल के साथ एक म...ाडल लड़की होगी। पान मसाला खाने / सिगरेट पीने वालों की मर्दाना प्रभाव में डूबती दिखती है, मोटर साइकिल के नए माडल चलाने वालों को पसन्द करती है। बहुत थोड़े से विज्ञापन हैं जो मसले और भावनाओं पर केन्द्रित हैं। वी आई पी चड्ढी पहना मर्द उसे गुण्डों से बचाता है।
ये है उपभोक्तावाद, कि माल ख़रीदने के आकर्षण के लिये एक औरत सामने कर दो। बताओ की अला फला ड्योडरेन्ट लगाओ और लड़कियों का चुम्बक बन जाओ।
तो नारी की आज़ादी की बात बेजा है। झुट्ठे लिबरल मर्द और समाज की बात होती रहती है|