Monday, February 17, 2014

युवा अभियान

नारायण देसाई ने युवा राजनीति पर एक पुस्तक लिखी थी। जिसकी प्रस्तावना से पहले, रविन्द्रनाथ जी की कविता थी, आप भी पढ़िये:

हे नवीन, हे मेरे कच्चे!
हे हरे, हे अबोध!
अधमुओं को आघात कर तू बचा ।
रक्तिम आलोक के मद से मत्त भोर में
आज तुझे कोई कुछ भी कहे, कहने दे ।
सर्व तर्कों को अवहेलना से तुच्छ कर,
तू अपनी पुच्छ ऊँची कर नाच रे,
आ रे दुरंत, आ रे मेरे कच्चे !
बारामदे में उनके
मृदुल समीर में पिंजड़ा झूलता है ।
और तो कुछ डोलने लायक
है ही वहाँ क्या रे?
वे प्रवीण हैं,
परम परिपक्व हैं ।
अपने ही डैने से अपने चक्षु एवं कणों को ढाँक
झूमते हैं चित्रपट में अंकित -से
अंधकार में बंद पिंजड़े में ।
आ रे जीवंत, आ रे मेरे कच्चे !
बाहर की ओर देखते नहीं वे कोई ।
यह देखते नहीं कि पुकारा है बाढ़ ने,
प्रबल लहरें उठ रहीं है ज्वार के जल में ।
मिट्टी पर पैर देकर नहीं चाहते चलना ।
ऊँचे बाँस के मकान वे बनाकर बैठे हैं, अविचल
अपने आसन जमाकर ।

आ रे अशांत, आ रे मेरे कच्चे !

तुझे यहाँ सभी करेंगे मना ।
किन्तु हठात् जब देखेंगे आलोक,
तब सोचेंगे कि यह क्या भीषण काण्ड हुआ !
तेरे संघात से वे
गरम हो उठेंगे ।
शयन छोड़कर आयेंगे दौड़े ।
उस सुयोग में
निद्रा से जागकर
छिड़ जायेगी लड़ाई सत्य एवं मिथ्या की ।
आ रे प्रचण्ड, आ रे मेरे कच्चे !

जंजीर देवी की यह जो है पूजा-वेदी,
क्या वह बनी रहेगी, चिरकाल तक ?
पागलपन, तू द्वार तोड़कर आ रे !
लहराये मत्त आँधी की विजय - पताका,
अट्टहास्य से चीरते हुए सारा आकाश,
झकझोरते हुए भोलेनाथ की झोली को,
बीन-बीनकर बटोरते हुए सारी भूलों को,
आ रे प्रमत्त, आ रे मेरे कच्चे !

खींच के ला तू, पक्की सड़क के छोर पर ।
अनिर्बन्ध की ओर अभिमुख कर,
बे-लगाम कर दे।
पथ काट के चल अजाने देश को ।
आपद है: जानते हैं हम ।
आघात है: यह जानकर तो वक्ष में
प्राण नाच उठते हैं ।
छोड़ दे राह चलने के वे वििध-िवधान,
उन पोथी पण्डितों के लिए ।
आ रे प्रमुक्त, आ रे मेरे कच्चे !

चिरयुवा ! तू तो चिरंजीवी है ।
जीर्ण जरा को झाड़कर,
अस्फुर्त प्राण को ठेलकर,
दे दे, बेहद दे दे ।
अपने कच्चेपन के नशे से
तूने विभोर कर दिया है धरा को ।
आँधी के मेघ में, तेरी ही तड़ित् चमकती है,
अपने गले की बकुल माला वसन्त के कण्ठ में पहनाकर,
आ रे अमर, आ रे मेरे कच्चे !

'बलाका' से

-- रविन्द्रनाथ ठाकुर